Sunday, 18 May 2014

प्रोमिथियस 

क्या तुम्हें 
ये आग नही दिखाई देती 
जो ज्वाला बन पेट में धधकती है 
रोटी पकाती उंगलियों मे 
उभर आती है गाँठ बन 
और आँखों मे उबल पड़ती है 
मेरे यकीन मे उतर आती है ........

आग ढूँढने
तुम कहाँ चले गए थे
प्रोमिथियस ...!

संध्या

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