प्रोमिथियस
क्या तुम्हें
ये आग नही दिखाई देती
जो ज्वाला बन पेट में धधकती है
रोटी पकाती उंगलियों मे
उभर आती है गाँठ बन
और आँखों मे उबल पड़ती है
मेरे यकीन मे उतर आती है ........
आग ढूँढने
तुम कहाँ चले गए थे
प्रोमिथियस ...!
संध्या
क्या तुम्हें
ये आग नही दिखाई देती
जो ज्वाला बन पेट में धधकती है
रोटी पकाती उंगलियों मे
उभर आती है गाँठ बन
और आँखों मे उबल पड़ती है
मेरे यकीन मे उतर आती है ........
आग ढूँढने
तुम कहाँ चले गए थे
प्रोमिथियस ...!
संध्या
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