रोजनामचा (5)
मौसम किस तरह दबे पाँव अपना रंग बदल लेता है ,बिना ज़रा सी आहट किए अभी सर्द था फिर नीम गर्म और अब लगता है की जैसे कभी ठंडा भी था क्या ....तुर्श धूप का झोका मुझे उठाता है खिड़की से झाँकता हुआ और एक किरण जैसे सीधी आँख मे पड़ती है मुसकुराती हुई....काम समय पर ख़त्म करने की आवाज़ें थोड़ा और सोने के लालच को दूर भगा देती हैं ....|
किसी का सुख किसी के लिए दुख लिए होता है जैसे बंधी मुठ्ठियों मे बंधे सुख की ओर टकटकी लगाए चार नयन ताक मे ही बैठे होते हैं कि, जाने किस ओर ये मुट्ठी खुलेगी ,पता नहीं कब ये इतने सुशिक्षित आत्मविश्वासी मन इतने नन्हें नन्हें सुखो की बाट जोहने लगते हैं... और इतने स्वार्थी हो उठते हैं ...और ये मुठ्ठिया ? इनको कौन हक दे देता है कहीं भी हाथ भर बाट देने का ? जैसे एक सोच समझ कर किए गए प्रेम की जकड़न में फसा लिया गया हो और मन बस देखता ही रह जाता है.....इतना कमज़ोर होता है क्या मन ? कभी लगता है अगर जिससे हम प्रेम करते हैं अपना मानते हैं उस ओर सोचते हैं तो कहीं और भी कुछ अन्याय होता महसूस करते हैं या ये सब बस मन के खेल हैं...जब तक जहाँ तक कोई खेल ले ...?...इन सब बतकही से दूर अपने काम मे जूझ जाती हूँ |
तेज़ धूप का असर है जो ये चमक आँखों मे पड़ रही है... रोज़ किसी नए ....बनती इमारत का श्रीगणेश होता दिखाई देता है...कहाँ से इतना पानी आएगा ...इतनी सीमेंट ....और दिन पर दिन बढ़ते हुये लोग
आखिर एक दिन ये धरती कह ही देगी अब बस ..... नहीं झेला जाता मुझसे इतना बोझ ....|गाड़ी पार्क कर उतरती ही हूँ कि एक हल्का सा चक्कर महसूस करती हूँ.....अरे ये क्या...सच में कल से थोड़ा कुछ खा कर ही निकलना होगा वरना ....कुर्सी पर बैठते ही मोबाइल घनघना उठता है कभी कोई दोस्त कभी पतिदेव...भूकंप महसूस हुआ क्या ...?...ओह ...! तो ये भूकंप का हल्का सा एहसास था चक्कर नही ...और मैं ऐसे ही कुछ भी सोचने लग पड़ी ,फिर तो नेपाल ,काठमाण्डू ,बिहार, देहली और सारे भारत से भूकंप की खबरें आने लगी ....सोचती हूँ ये जो मुझे अजीब से ख़याल आ रहे थे ये कोई पूर्वाभास था ...जो ज़मीन कह रही थी ?
काम को लेकर अजीब सा माहौल है ऑफिस में जैसे सब अपने अपने स्वार्थ के आगे झुके हुये हैं कोई भी देखने को तैयार ही नही है किसी की मजबूरी और पीठ पीछे अजीब अजीब साजिशें अपनी कानाफूसियाँ कर रही हैं अजनबी आवाज़ें दस्तक दे रही हैं ....अगर कोई लक्ष है तो वो है पैसा .... जहाँ से भी मिले जैसे भी मिले ....इसी सी सारे समीकरण तय होने हैं कौनसा कर्मचारी किसके पास जाएगा और कौनसा...वार्ड कितनी आमदनी वाला है ...जहाँ जाने से फायदा मिल सकेगा |अगर आप न चाह कर भी इन सारी बिछी बिसातों में से किसी न किसी के खेल मे चाहे अनचाहे गिरफ्तार हो ही जाते हैं ,एक अनचाही लड़ाई लड़ते हुये |
टेबल पर लिखते हुये ,हल्का से बाज़ू की ओर नज़र पड़ती है तो ...लाफिंग बुधधा जैसे पीठ पर गठरी लादे हुये तैयार खड़े होते हैं...मुस्कुरा कर पूछती हूँ उनसे "आज क्या है मेरे लिए इसमे "? अरे वाह ! पहले मुझे मेरा इनाम दो फिर खोलूंगा गठरी " " लो आपको भी भूत चड़ गया क्या "?"सब के सब बेताल हुये जा रहे हैं
इन्हे पता ही नहीं मुझे मेरा आज का हिस्सा मिल चुका है "|और जैसे मुझे आज सुबह के सवाल का जवाब भी मिल जाता है अपना अपना हिस्सा है ,अपना अपना किस्सा है और इस भूकंप ने भी बताया कल क्या होगा किसको पता .........."लव इन द टाइम ऑफ कोलेरा "मारखेज अपने पन्नों मे मुस्कुरा रहे है ....जीवंतता की मोहर लगा रहे हैं ....सभी अपनी अपनी कमजोरियों और मज्बूतियों के साथ डटे हैं !
रात जैसे लंबी हो गई है सुबह जल्दी आ जाती है आजकल ...उसी किरण से मिलना है सुबह उठ कर ।मगर एक अलग अंदाज़ से ...बिना सवाल...पूछे जवाबों को जीते हुये ...धन्यवाद यारम !आज मगर नींद भी इंतज़ार मे है .....|
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