रोजनामचा (4)
यूँ तो हर शहर का अपना मिजाज होता है ,पर जहाँ कोई आपका अपना इंतज़ार कर रहा होता है तो उस शहर की बात ही अलग होती है ना... ये नई उम्र के युवा(बिटिया) जिनके लिए समय उतना ही कीमती है जितनी उन्हे अपनी ज़िंदगी प्यारी होती है | सुबह से शाम तक अपनी ऊर्जा को चरम तक निचोड्ते जैसे नहीं जानते थकान का नाम भी और सप्ताहांत पर अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर भूल जाना चाहते हैं अपने काम के तनाव को साथ ही सारे रिश्ते पूरी शिद्दत से निभाते....मन सचमुच गर्व से भर आया है |....शहर की भीढ़ रफ्तार ओर ऊर्जा के साथ कदमताल करते अपने शहर की याद घना जाती है |
अपने शहर मे प्रविष्ट करते ही कड़ी धूप स्वागत करती है ,गर्मी अपने शबाब पर है यात्रा की थकान घर के ख़याल मात्र से काफ़ूर हो जाती है ,काम की थकान रोज़मर्रा की एकरसता से भागा मन फिर -फिर अपने ठाँव पर ही आराम पाना चाहता है ...सच कहते है गुलज़ार भी की ,ये आदतें भी कितनी अजीब होती हैं...ओर ये बंजारा मन ...? घर पर बेटू जी एक ग्लास ठंडा पानी देता है ,पतिदेव झट मुझे घर छोड़ कर ऑफिस रवाना होते हैं |दोस्त हाल हवाल पूछते हैं कहाँ हो ...? गुमशुदा ....और कोई है जो आपको हर हाल में याद रखता है रखना चाहता है ,बस चाहता है आप हर हाल में खुश रहें एक ऐसा दोस्त लगावट वाला रिश्ता जिसे शायद आप कोई नाम देना नहीं चाहते हैं |कोई नाम सुबह की गुनगुनी धूप सा ठंडी शाम सा इत्मीनान सी रात सा जिसे आप अपने सक्षिप्त प्रवास में भूले रहना चाहते हैं |और सिर्फ ओर सिर्फ रहना चाहते हैं अपने साथ...मगर नज़र का फेर ...कलम में ऐसा उतारने का खवाब पाले रहते हैं कि , हर नज़ारा अपने परिपूर्ण फ्रेम में ही दिखाई देता है खुद का अस्तित्व भी जैसे इसी खांचे में फिट हुआ नज़र आता है |
मोबाइल पर व्हाट्टसप्प पर बिटिया से जुड़े रहना सुकून देता है ,पर वहाँ की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी देख लेने के बाद और स्वयं के प्रति लापरवाह इस युवा नस्ल की जीवनशैली देख लेने के बाद मन आशंकाओं से भी घिर जाता है ... फिर लगता है ये ही इनका जीवन जीने का तरीका है हमारे धीमी रफ्तार जीवन से काफी अलग ये जानते हैं अपनी रक्षा करना ,जीना और खुश रहना |यही सोचकर धीरे- धीरे सामान्य हो जाती हूँ |
कुछ है जो बदल रहा है शहर को सड़कों को......चोड़ी होती सड़के कम होते पेड़ ,गाड़ियों की लंबी लंबी कतारे ,बढ़ता अधैर्य .... शायद ही कोई दिन होता हो जब सड़क पर होता हुआ कोई एक्सिडेंट न देखा हो ,ओर शायद इसलिए जब ऑफिस से लौटती हूँ हूँ तो ये काली सी सड़क लाल होती दिखाई देती है मुझे लीलती हुई ....
इंच दर इंच ट्रेफ़्फ़िक जाम में फसी रेंगती हुई ....घर जाने का सुखद एहसास सब कुछ सहने को मजबूर कर देता है |जिस रफ्तार से सोश्ल मीडिया पर दोस्तों की संख्या बढ़ रही है उसी रफ्तार से अवसाद और अकेलापन भी जैसे बढ़ रहा है ॥भावुक मन अपने जंजाल बढ़ाता नज़र आता है हर ओर .... जिसे कभी तो किसी बीमारी का नाम देने का मन करता है ... या ये कोई किसी नई नस्ल का "कायांतरण " है मात्र ?
घर पर टेबल पर रखी हुई डी एहच लारेंस की" संस एंड लवर्स "के किसी पृष्ठ पर रखा बुक मार्क का चेहरा मुस्कुरा रहा है कहता हुआ...."बिटिया से मिलने गई तो संस एंड लवर्स को भूल ही गई ? क्यों ? ...." लो इनकी शिकायतें भी सुनो अब....मैं होले से मुस्कुरा देती हूँ ....|पानी की आधी भारी बोटल जैसी छोड़ गई थी जल्दी में वैसी ही पड़ी है दो टिपके धर देती हूँ और एक अर्ध चंद्र बना देती हूँ अब मुस्कुरा रही है बोटल " शुक्र है हमारी भी सुध ली बन्नो ने " | जैसे हर समान बात सा कर रहा है मुझसे ...कैसा चमत्कार बेणुगोपाल मुस्कुरा रहे हैं पन्ने फड़फड़ा कर अपनी उपसतिथी दर्ज करा रहे हैं ... वेणुगोपाल की कविताएँ और डी एच लारेंस का ...मोकटेल ..(कभी पी देखिएगा ) |
वक्त के साथ खुद को बदलने की कवायद करता हुआ मन ,थकान में डूबा सोच की गठरी बंधे रहना कब छोड़ेगा ? नींद का इंतज़ार .....!
यूँ तो हर शहर का अपना मिजाज होता है ,पर जहाँ कोई आपका अपना इंतज़ार कर रहा होता है तो उस शहर की बात ही अलग होती है ना... ये नई उम्र के युवा(बिटिया) जिनके लिए समय उतना ही कीमती है जितनी उन्हे अपनी ज़िंदगी प्यारी होती है | सुबह से शाम तक अपनी ऊर्जा को चरम तक निचोड्ते जैसे नहीं जानते थकान का नाम भी और सप्ताहांत पर अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा खर्च कर भूल जाना चाहते हैं अपने काम के तनाव को साथ ही सारे रिश्ते पूरी शिद्दत से निभाते....मन सचमुच गर्व से भर आया है |....शहर की भीढ़ रफ्तार ओर ऊर्जा के साथ कदमताल करते अपने शहर की याद घना जाती है |
अपने शहर मे प्रविष्ट करते ही कड़ी धूप स्वागत करती है ,गर्मी अपने शबाब पर है यात्रा की थकान घर के ख़याल मात्र से काफ़ूर हो जाती है ,काम की थकान रोज़मर्रा की एकरसता से भागा मन फिर -फिर अपने ठाँव पर ही आराम पाना चाहता है ...सच कहते है गुलज़ार भी की ,ये आदतें भी कितनी अजीब होती हैं...ओर ये बंजारा मन ...? घर पर बेटू जी एक ग्लास ठंडा पानी देता है ,पतिदेव झट मुझे घर छोड़ कर ऑफिस रवाना होते हैं |दोस्त हाल हवाल पूछते हैं कहाँ हो ...? गुमशुदा ....और कोई है जो आपको हर हाल में याद रखता है रखना चाहता है ,बस चाहता है आप हर हाल में खुश रहें एक ऐसा दोस्त लगावट वाला रिश्ता जिसे शायद आप कोई नाम देना नहीं चाहते हैं |कोई नाम सुबह की गुनगुनी धूप सा ठंडी शाम सा इत्मीनान सी रात सा जिसे आप अपने सक्षिप्त प्रवास में भूले रहना चाहते हैं |और सिर्फ ओर सिर्फ रहना चाहते हैं अपने साथ...मगर नज़र का फेर ...कलम में ऐसा उतारने का खवाब पाले रहते हैं कि , हर नज़ारा अपने परिपूर्ण फ्रेम में ही दिखाई देता है खुद का अस्तित्व भी जैसे इसी खांचे में फिट हुआ नज़र आता है |
मोबाइल पर व्हाट्टसप्प पर बिटिया से जुड़े रहना सुकून देता है ,पर वहाँ की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी देख लेने के बाद और स्वयं के प्रति लापरवाह इस युवा नस्ल की जीवनशैली देख लेने के बाद मन आशंकाओं से भी घिर जाता है ... फिर लगता है ये ही इनका जीवन जीने का तरीका है हमारे धीमी रफ्तार जीवन से काफी अलग ये जानते हैं अपनी रक्षा करना ,जीना और खुश रहना |यही सोचकर धीरे- धीरे सामान्य हो जाती हूँ |
कुछ है जो बदल रहा है शहर को सड़कों को......चोड़ी होती सड़के कम होते पेड़ ,गाड़ियों की लंबी लंबी कतारे ,बढ़ता अधैर्य .... शायद ही कोई दिन होता हो जब सड़क पर होता हुआ कोई एक्सिडेंट न देखा हो ,ओर शायद इसलिए जब ऑफिस से लौटती हूँ हूँ तो ये काली सी सड़क लाल होती दिखाई देती है मुझे लीलती हुई ....
इंच दर इंच ट्रेफ़्फ़िक जाम में फसी रेंगती हुई ....घर जाने का सुखद एहसास सब कुछ सहने को मजबूर कर देता है |जिस रफ्तार से सोश्ल मीडिया पर दोस्तों की संख्या बढ़ रही है उसी रफ्तार से अवसाद और अकेलापन भी जैसे बढ़ रहा है ॥भावुक मन अपने जंजाल बढ़ाता नज़र आता है हर ओर .... जिसे कभी तो किसी बीमारी का नाम देने का मन करता है ... या ये कोई किसी नई नस्ल का "कायांतरण " है मात्र ?
घर पर टेबल पर रखी हुई डी एहच लारेंस की" संस एंड लवर्स "के किसी पृष्ठ पर रखा बुक मार्क का चेहरा मुस्कुरा रहा है कहता हुआ...."बिटिया से मिलने गई तो संस एंड लवर्स को भूल ही गई ? क्यों ? ...." लो इनकी शिकायतें भी सुनो अब....मैं होले से मुस्कुरा देती हूँ ....|पानी की आधी भारी बोटल जैसी छोड़ गई थी जल्दी में वैसी ही पड़ी है दो टिपके धर देती हूँ और एक अर्ध चंद्र बना देती हूँ अब मुस्कुरा रही है बोटल " शुक्र है हमारी भी सुध ली बन्नो ने " | जैसे हर समान बात सा कर रहा है मुझसे ...कैसा चमत्कार बेणुगोपाल मुस्कुरा रहे हैं पन्ने फड़फड़ा कर अपनी उपसतिथी दर्ज करा रहे हैं ... वेणुगोपाल की कविताएँ और डी एच लारेंस का ...मोकटेल ..(कभी पी देखिएगा ) |
वक्त के साथ खुद को बदलने की कवायद करता हुआ मन ,थकान में डूबा सोच की गठरी बंधे रहना कब छोड़ेगा ? नींद का इंतज़ार .....!
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