Sunday, 14 June 2015

    फर्क



वो उगाते हैं फूल
रंग बिरंगे
बिखेरते खुशबूयेँ
बनाते हैं शिल्प मिट्टी  के
माटी दिखाती है राह
फूल बिखेरते खुशबू

एक लिखता कविता
कभी कोई प्रश्न उठाती
उत्तर देती हुई कोई
खुशबू से तर कभी ....

कितने रंग ज़िंदगी के
लाते चमक आँखों में
इंद्रधनुष बिखेरते
 जीवन का .....

और एक वो
शक्ति और अधिकार से सजा
अपने आडंबर में क़ैद
पीड़ा देकर पाता हुआ सुख
चमक उसके आँखों मे भी आती
आत्मसंतोष की ....

गंदे रेंगते हुये कीड़े फैलते जाते
जहाँ से गुजरता वो ....!

संध्या





मेरे संकल्प बीज



हर दिन खुलती आँख ज्यों ही
एक नया ही आसमान होता सामने
आँखें सिर्फ दो
सामने कितने ही दृश्य बिन्दु  

कहीं अंधश्रधधा का आतंक
कहीं टूटे विश्वास की दरकन
कहीं त्वचा के नीचे दबी
कुंठा का मवाद
कहीं अतिरेक मन का
कहीं लिप्सा का घटाटोप
कहीं मुंहबाए खड़े भाव चक्षु
पूछते गंतव्य का सिरा ...

गुज़र जाना होता है हर दृश्य को चीरते हुये

खुली आँखें तनी गर्दन और
लिए द्रढता की पोटली लिए हाथों
बाहर निकलते ही
फिसल जाते लक्ष्य अक्सर

कानों में बजती चीखें
आतंक की स्याही
और अनकहे अनचीन्हे
षड्यंत्रों की बजबजाती आवाज़ें ...

निकल आती हूँ इन सबसे बाहर ,थोड़ी घायल
पर सलामत ...

अपनी पोटली में दबाये
अपने संकल्प बीज ....!


संध्या



     



पुनरावृति


कभी-कभी
रह जाती है एक जुगाली
नन्हें से एक लम्हे की
जो कभी का गुज़र चुका होता है
याद के घेरे पीछा नहीं छोड़ते
ज़िंदगी बस करती रहती है
उसकी पुनरावृति    !


संध्या 




अपना आकाश 



शुक्र है 
दिखता है तालाब और हरियाली 
खिड़की से बाहर 

वरना रीड़ मे उतर आते हैं अक्सर 
अंकों की जमा जोड़ 
मृत करते हैं किसी कविता की 
उगती संभावना को 

दफ्तर में कैद आवाज़ें 
चमगादड़ों की आवाज़ में तब्दील हो जाती हैं 
मंडराती हैं सर के ऊपर 

अपने सही जगह पर होने का अंदेशा 
मुझे अक्सर सालता रहता है 
एक वेतन की स्लिप 
तोड़ देती है सारे मुगालते...
अपनी दुनिया मुझे पुकारती है 
इस तरह दो दुनिया में बटे हम  

तलाशते हैं अपना आकाश ...! 


संध्या 

        






Friday, 12 June 2015

नदी


नदी उफान पर थी

बस आश्चर्यचकित थी
जब बिखरी थी इंद्रधनुषी छटा
बिल्कुल न थे बादल
तब इतना उफान आखिर
आया कहाँ से ...

गुपचुप सी
भरती रही नदी
इतना कोलाहल लिए
उमगती रही नदी

किनारे खड़ी हूँ
उतार के इंतज़ार में

पानी की तुर्श धार से
घायल ,झिरझिर हो आए पत्थर
बताएंगे अपनी व्यथा
छितर आए शंख सुनाएंगे
अनकहे गीतों की धुन

शायद किसी सीपी ने
छिपा रखा हो मोती भी
अपने भीतर .....!!


संध्या




रफ्तार


हाथों के पास
काम बहुत था
चीज़ों को थामे रखने को
दरकार थी विशेष दक्षता

करना था हाथों को
यथेष्ट कभी खुरदरा
और कभी चिकना

समय की रफ्तार तेज़ थी
और अंदाज़ा लगाने की
कुछ कम

फिसलन थामने को हाथों को
करना था कुछ खुरदरा
खुरदरी सतह के लिए
चाहिए थी चिकनाई कुछ

साथ-साथ करने थे
रफ्तार के समीकरण हल
अवश्यंभावी था
कुछ न कुछ छूटते रहना
छूटता ही रहता

(रफ्तार ओर संतुलन साधते जीत अक्सर रफ्तार की ही हुई )


संध्या



बाज़ार


एक पूरा भीड़ भरा बाज़ार
सामानों से अटा बाज़ार
सामानों मे आदमी
आदमी मे भरता सामान
ओर यह रहा मुस्कान मेचिंग सेंटर
पता नहीं दुकान मे मुस्कान
या मुसकानों ने ओढ़ ली मुस्कान
धीरे धीरे समान धोता आदमी
सामान होता हुआ
सामान की भाषा बोलने लगता

फिर आदमी के अंदर से बोलता सामान  !


संध्या