नदी
नदी उफान पर थी
बस आश्चर्यचकित थी
जब बिखरी थी इंद्रधनुषी छटा
बिल्कुल न थे बादल
तब इतना उफान आखिर
आया कहाँ से ...
गुपचुप सी
भरती रही नदी
इतना कोलाहल लिए
उमगती रही नदी
किनारे खड़ी हूँ
उतार के इंतज़ार में
पानी की तुर्श धार से
घायल ,झिरझिर हो आए पत्थर
बताएंगे अपनी व्यथा
छितर आए शंख सुनाएंगे
अनकहे गीतों की धुन
शायद किसी सीपी ने
छिपा रखा हो मोती भी
अपने भीतर .....!!
संध्या
नदी उफान पर थी
बस आश्चर्यचकित थी
जब बिखरी थी इंद्रधनुषी छटा
बिल्कुल न थे बादल
तब इतना उफान आखिर
आया कहाँ से ...
गुपचुप सी
भरती रही नदी
इतना कोलाहल लिए
उमगती रही नदी
किनारे खड़ी हूँ
उतार के इंतज़ार में
पानी की तुर्श धार से
घायल ,झिरझिर हो आए पत्थर
बताएंगे अपनी व्यथा
छितर आए शंख सुनाएंगे
अनकहे गीतों की धुन
शायद किसी सीपी ने
छिपा रखा हो मोती भी
अपने भीतर .....!!
संध्या
No comments:
Post a Comment