Sunday, 14 June 2015

    फर्क



वो उगाते हैं फूल
रंग बिरंगे
बिखेरते खुशबूयेँ
बनाते हैं शिल्प मिट्टी  के
माटी दिखाती है राह
फूल बिखेरते खुशबू

एक लिखता कविता
कभी कोई प्रश्न उठाती
उत्तर देती हुई कोई
खुशबू से तर कभी ....

कितने रंग ज़िंदगी के
लाते चमक आँखों में
इंद्रधनुष बिखेरते
 जीवन का .....

और एक वो
शक्ति और अधिकार से सजा
अपने आडंबर में क़ैद
पीड़ा देकर पाता हुआ सुख
चमक उसके आँखों मे भी आती
आत्मसंतोष की ....

गंदे रेंगते हुये कीड़े फैलते जाते
जहाँ से गुजरता वो ....!

संध्या

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