फर्क
वो उगाते हैं फूल
रंग बिरंगे
बिखेरते खुशबूयेँ
बनाते हैं शिल्प मिट्टी के
माटी दिखाती है राह
फूल बिखेरते खुशबू
एक लिखता कविता
कभी कोई प्रश्न उठाती
उत्तर देती हुई कोई
खुशबू से तर कभी ....
कितने रंग ज़िंदगी के
लाते चमक आँखों में
इंद्रधनुष बिखेरते
जीवन का .....
और एक वो
शक्ति और अधिकार से सजा
अपने आडंबर में क़ैद
पीड़ा देकर पाता हुआ सुख
चमक उसके आँखों मे भी आती
आत्मसंतोष की ....
गंदे रेंगते हुये कीड़े फैलते जाते
जहाँ से गुजरता वो ....!
संध्या
वो उगाते हैं फूल
रंग बिरंगे
बिखेरते खुशबूयेँ
बनाते हैं शिल्प मिट्टी के
माटी दिखाती है राह
फूल बिखेरते खुशबू
एक लिखता कविता
कभी कोई प्रश्न उठाती
उत्तर देती हुई कोई
खुशबू से तर कभी ....
कितने रंग ज़िंदगी के
लाते चमक आँखों में
इंद्रधनुष बिखेरते
जीवन का .....
और एक वो
शक्ति और अधिकार से सजा
अपने आडंबर में क़ैद
पीड़ा देकर पाता हुआ सुख
चमक उसके आँखों मे भी आती
आत्मसंतोष की ....
गंदे रेंगते हुये कीड़े फैलते जाते
जहाँ से गुजरता वो ....!
संध्या
No comments:
Post a Comment