परिवर्तन
मैं देख रही हूँ इस पूरे तंत्र को
तंत्र मेंरहते हुये
लड़ रही हूँ इसके साथ
बिना अपनी बनावट में परिवर्तन की ज़िद लिए
सामने सां ,दाम ,दंड, भेद लिए
तैयार खड़ी है सेना ,आक्रमण को तत्पर
आतुर बेधने को ,चक्रव्यूह बना ...
परंपराए बादल रही हैं
झील पर तन रही हैं जालियाँ
हट रहे हैं पेड़ ,सड़क के दोनों ओर से
मैंने भी बदल लिया है बालों को बनाने का तरीका
लेकिन नहीं बदल पाया मन ...
नसों का बहाव ,ओर दिल का धड़कना
मेरा चश्मा भी ...
वो एक लड़का मुझे देता है जगह
झील किनारे बेंच पर बैठने की... मुस्कुराते हुये
झील पर बहते पत्ते पर कुछ चीटीयाँ
ओर उनके मुँह में दबे हुये हैं दाने...
उम्मीद ,जुड़ाव और प्रेम के बीच का रिश्ता
बता जाते हैं मुझे ...
कुछ भी नहीं बदला है मेरे दोस्त ....!
संध्या
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