Thursday, 3 April 2014



कता 


लगा, एक ही सांचे मे ढले हैं, बने हैं हम ,
डूबे ,हाँफे ,रुके हैं ज़रा, फिर चले हैं हम ! 

संध्या

डर



खुशबू बिखरा गया था कोई 
समेट,आँचल में बांध ली थी गाँठ 

गाँठ खोलने में डर सा लगता है अब .... 

संध्या
अजायब घर 


दुराव रखा सदा
बताया नही कभी
प्रेम किया सदा
जताया नही कभी

अपनी रुलाई
और कभी अपनी हंसी के बीच
अजूबा बना लिया खुद को

भावना के सत्य को 
इस कदर छुपाया
कि,उसके अस्तित्व पर किए गए शक को
खुद ही शक की नज़र से देखा अक्सर ...

मनुष्योतर होने के प्रयास मे
मनुष्यता को किया अनदेखा प्राय:
ऐसा कि,मानव होने पर होने लगे शुबहा ...

पत्थर होते चले जाने को
माना मानव होना
पर जब पत्थर पड़े
तो टूटने से न बचा पाया खुद को

अंतत:
हो गया तब्दील ......
एक अजायबघर में
जिसका तरजुमा नहीं ... !

संध्या
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असीम तुम 

रंगों मे उकेरा 
रंग कुछ कम पड़ गए 
शब्द ढूँढते ही रह गए 
अर्थ ढल न पाये 
भावों में वो भाव ही न मिला 
जो नाम था 

पूरा तुम्हें रखते 
ऐसी जगह ही ना थी .......

संध्या
अंजरी भर 



हम अपनी 
पवित्र आकांक्षाओं से 
बांध लेते हैं कई सतरें

ये एक ओस की बूंद बन 
हरी -हरी पातों की झालरों के 
बीच दिल बन ठहर जाती हैं ....

आकांक्षाओं की ये बूँदें
एक पात से दूजी पात पर
गिरती हुई छोड़ जाती है अक्स अपने
सतर दर सतर ...

और कर लेना चाहते हैं हम संरक्षित
इन बूँदों को हमेशा -हमेशा के लिए
एक सिर्फ अपने लिए ...
इनके चिरंतन स्वभाव के बरक्स

देने और पाने की
रस्साकशी /रफ्तार के बीच
गड़बड़ा जाता है अक्सर
इनका ' पृष्ठ तनाव '

हरी भरी पाते जगमगा उठती हैं
सीख जाती हैं सांसे लेना
लहक लहक कर ...!

( अंजरी भर संभाल ही तो रखना चाहा है बस ......)

संध्या
महुए की गाँठ 


राही 
महुए की गाँठ ,जड़ों में भूल 
चल दिया आगे ...

मन महुए की खाद बना 
पेड़ सरसराता रहा 

एक परत छिल गई थी पेड़ की 
राही को नही पता ...!

संध्या
रफ्तार 


हाथों के पास 
काम बहुत था 
चीज़ों को थाम रखने को 
विशेष दक्षता की ज़रूरत थी 

करना था हाथों को 
यथेष्ट कभी खुरदरा 
और कभी चिकना 

समय की रफ्तार तेज़ थी 
और अंदाज़ा लगाने की कुछ कम

फिसलन थामने को
हाथों को करना था खुरदरा
खुरदरी सतह के लिए
दरकार थी चिकनाई की

साथ-साथ करने थे
रफ्तार के समीकरण हल
कुछ न कुछ छूटता ही रहता अक्सर ...

( रफ्तार और संतुलन में अक्सर जीत रफ्तार की ही हुई )

संध्या