Thursday, 3 April 2014

अजायब घर 


दुराव रखा सदा
बताया नही कभी
प्रेम किया सदा
जताया नही कभी

अपनी रुलाई
और कभी अपनी हंसी के बीच
अजूबा बना लिया खुद को

भावना के सत्य को 
इस कदर छुपाया
कि,उसके अस्तित्व पर किए गए शक को
खुद ही शक की नज़र से देखा अक्सर ...

मनुष्योतर होने के प्रयास मे
मनुष्यता को किया अनदेखा प्राय:
ऐसा कि,मानव होने पर होने लगे शुबहा ...

पत्थर होते चले जाने को
माना मानव होना
पर जब पत्थर पड़े
तो टूटने से न बचा पाया खुद को

अंतत:
हो गया तब्दील ......
एक अजायबघर में
जिसका तरजुमा नहीं ... !

संध्या
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