शहरनामा : रोजनामचा (2)
सुबह के लबादे में कैद मौसम अपनी ओस की एक महीन सी परत हर ओर बना देता हैं ...गिरते पानी ने सड़क को ढाप लिया है समय की पांत जैसे कुछ कम चौड़ी हुई जान पड़ती है काम करते हुये घड़ी कुछ तेज़ भागती हुई लग रही है.....उफ्फ ! ये सर्द दिन ...
सड़कों पर चुनावी सरगरमियाँ यथावत हैं स्पीकर पर गूँज रही हैं आवाज़ें " हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के " दिल दिया है जाँ भी देंगे ए वतन तेरे लिए "ज़ोर शोर से पटाखों की आवाज़ें गूँजती हैं और फिर आवाज़ें "हम एक स्वच्छ और सुंदर भोपाल का वादा पूरा कर दिखाएंगे " और उनकी गाडियाँ गंदगी ज्यों की त्यों छोड़ आगे बढ़ जाती हैं ...दो -तीन पार्टियों की आमने सामने मुठभेड़ हो जाती है..... और भागती हुई सड़क यकबयक थम जाती है ट्रेफ़्फ़िक जाम .... एकदम पीक आवेर और हॉर्न की बढ़ती जा रहीं बेचैन आवाज़ें ....सेंसर मशीन पर अंगूठा लगा कर उपस्थिति दर्ज करने का तनाव मुझे भी घेर लेता है ... खुदाई से छोटी हो गई सड़क आने वाले लोग जाने वाले लोग उसी संकरी जगह से गाड़ी निकालने की अपनी अपनी कवायद में लीन और ज़रा आगे रेल्वे फाटक पर लाल बत्ती ...उफ्फ !!
कुछ निर्णयों को मुलतवी रखे जाने के बीच एक -एक कर हमारे बीच से किसी बड़े का कम होते चले जाना और उन्ही सब के बीच ... भीतरघात,उपालंभ और कुंठाओं की नमी से उपजे पौधे चारों ओर फैलते नज़र आने लगे हैं ..... कब किस कुंठा ने किस पौधे को आकार दिया ये उसके ज़हरीले पत्तों ने बताया अंदरूनी त्वचा पर धीरे -धीरे पड़ते उसके घाव नज़र ही ना आते... बहुत अपने समझे जाने वाले दोस्त.... रिश्ते समझे जाते थे जो उन्हे भी ना बताया जा सकता था इनके बारे में
"मिलने मिलाने का सलीका रखिए " निदा फ़ाज़ली साहब याद आते हैं बारीक सी भाव परत को सलीके से दबाये रखकर साथ -साथ चलते रहने का का छदम पाले मन पर एक उदासी की परत जम आती है ...और दिन का चेहरा और भी कोहरे में डूबा लगता है और नेपथ्य मे सलिल चौधरी अपना राग बजाने लगते हैं ...तुम्हारी ....मान्द आवाज़ साथ देने लगती है ....|
अकेलापन और भी अकेला होते जाने को बाध्य है ...शहर और भी ज़्यादा शहर होता हुआ बाहर से फैलता हुआ.... अंदर से सुकड़ता हुआ .......
विन्ड्स्क्रीन पर कोहरे की परत जम जाती है शुक्र है आँखें साफ है ...पहियों के साथ सड़क पर जमी दोस्ती के बीच होड़ लगाती गीली मिट्टी की गाढ़ी परत साथ चली आती है .... तरल भाव कहीं छिटक जाते हैं बीच -बीच में ये मोटे से ढेले मिट्टी के... तो विजेंद्र गाड़ी साफ कराते हुये साफ कर देता है मन पर जमी छदम को देखती परखती मिट्टी की परतें.... जिन्हे काट कर अलग करने को कोई चाकू नहीं .....
इसी मिट्टी की गीली परत पर शब्द कुछ निखर कर उभर कर दृष्टव्य होते हैं ...
डायरी का सफ़ेद पन्ना मुझे मुह सा चिढ़ा रहा है .......
सड़कों पर चुनावी सरगरमियाँ यथावत हैं स्पीकर पर गूँज रही हैं आवाज़ें " हम लाये हैं तूफान से कश्ती निकाल के " दिल दिया है जाँ भी देंगे ए वतन तेरे लिए "ज़ोर शोर से पटाखों की आवाज़ें गूँजती हैं और फिर आवाज़ें "हम एक स्वच्छ और सुंदर भोपाल का वादा पूरा कर दिखाएंगे " और उनकी गाडियाँ गंदगी ज्यों की त्यों छोड़ आगे बढ़ जाती हैं ...दो -तीन पार्टियों की आमने सामने मुठभेड़ हो जाती है..... और भागती हुई सड़क यकबयक थम जाती है ट्रेफ़्फ़िक जाम .... एकदम पीक आवेर और हॉर्न की बढ़ती जा रहीं बेचैन आवाज़ें ....सेंसर मशीन पर अंगूठा लगा कर उपस्थिति दर्ज करने का तनाव मुझे भी घेर लेता है ... खुदाई से छोटी हो गई सड़क आने वाले लोग जाने वाले लोग उसी संकरी जगह से गाड़ी निकालने की अपनी अपनी कवायद में लीन और ज़रा आगे रेल्वे फाटक पर लाल बत्ती ...उफ्फ !!
कुछ निर्णयों को मुलतवी रखे जाने के बीच एक -एक कर हमारे बीच से किसी बड़े का कम होते चले जाना और उन्ही सब के बीच ... भीतरघात,उपालंभ और कुंठाओं की नमी से उपजे पौधे चारों ओर फैलते नज़र आने लगे हैं ..... कब किस कुंठा ने किस पौधे को आकार दिया ये उसके ज़हरीले पत्तों ने बताया अंदरूनी त्वचा पर धीरे -धीरे पड़ते उसके घाव नज़र ही ना आते... बहुत अपने समझे जाने वाले दोस्त.... रिश्ते समझे जाते थे जो उन्हे भी ना बताया जा सकता था इनके बारे में
"मिलने मिलाने का सलीका रखिए " निदा फ़ाज़ली साहब याद आते हैं बारीक सी भाव परत को सलीके से दबाये रखकर साथ -साथ चलते रहने का का छदम पाले मन पर एक उदासी की परत जम आती है ...और दिन का चेहरा और भी कोहरे में डूबा लगता है और नेपथ्य मे सलिल चौधरी अपना राग बजाने लगते हैं ...तुम्हारी ....मान्द आवाज़ साथ देने लगती है ....|
अकेलापन और भी अकेला होते जाने को बाध्य है ...शहर और भी ज़्यादा शहर होता हुआ बाहर से फैलता हुआ.... अंदर से सुकड़ता हुआ .......
विन्ड्स्क्रीन पर कोहरे की परत जम जाती है शुक्र है आँखें साफ है ...पहियों के साथ सड़क पर जमी दोस्ती के बीच होड़ लगाती गीली मिट्टी की गाढ़ी परत साथ चली आती है .... तरल भाव कहीं छिटक जाते हैं बीच -बीच में ये मोटे से ढेले मिट्टी के... तो विजेंद्र गाड़ी साफ कराते हुये साफ कर देता है मन पर जमी छदम को देखती परखती मिट्टी की परतें.... जिन्हे काट कर अलग करने को कोई चाकू नहीं .....
इसी मिट्टी की गीली परत पर शब्द कुछ निखर कर उभर कर दृष्टव्य होते हैं ...
डायरी का सफ़ेद पन्ना मुझे मुह सा चिढ़ा रहा है .......
संध्या
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