Saturday, 21 March 2015

शहरनामा : रोजनामचा (3)
बसंत के आगमन की खुशबुओं को लपेटे चल रही हवाएँ कांधे को सहला रही हैं... सुबह थोड़ी ख़ुनकी लिए जगाती है और दिन जैसे चौंधियाहट के साथ गालों पर नीम गरम थपकियाँ देता है प्रांगण को पार कर मुख्य द्वार तक पहुँचते कदम सूखे पत्तों की खडखड़ाहट भरे होते हैं ...आदतन सभी सर्द शरद से उबर नही पाये हैं और अपने गरम कपड़ों मे ही ढके हुये नज़र आते हैं |
चुनाव की आवाज़ें अपने कुछ नर्म और कुछ गरम परिणाम लिए दस्तक दे रही हैं ... जीपों और गाड़ी में भरे हुये गुलाल बिखराए रंगे लोग जीत का जश्न मना रहे है.... कुछ हार का सोग भी मना रहे हैं |स्मृध्धि और विकास की शर्तों पर जीते गए चुनाव अपने अपने हिसाब किताब लगाने मे जुटे हैं ... चुनाव परिणाम के साथ ही एक अजीब सा सन्नाटा सा पसरा नज़र आता है ...|
और मुझे याद आ रही है वो बरगद की छाँव जिसके नीचे बड़े हुये... जिसने सिखाया अपने पैरों पर खड़ा होना... और अपने साथ खड़ी लता को सहारा दिया.... अब छोड़ गया है स्वयं ही हम सबको अकेला ...कैसे ज़हरीली हवाओं से स्वयं को अलग रखा जा सकता है..... रहा जा सकता है बेअसर ...ये उसीने सिखाया..... और लीन हो गया प्ंच्तत्व में ,,,,,,नितांत अकेला छोड़ कर हमें ....और उसी के तले पले- बढ़े पौधे उसी का स्वरूप पर कितना अलग.... और उनके कद के पासंग भी नहीं ...दिन पर दिन मुरझाती लता ने ले लिया है सहारा अब ...उन ही पौधों का ...पर कितने दिन ...?
बसंत अपने रंगों से हर बरस लुभाता है याद आता है ....पर खुद की आँखों की चमक से भीगा अवसाद बसंत को भी अवसादमय बना देता है ...और उल्लास का कोई बिखरा कण..... इसे उल्लासमय बना देता है ....कहीं खोया सा इंद्रधनुष झाँक जाता है... जैसे दो हिस्सों में बट गया हो बसंत... अलग -अलग नज़रों में कैद हुआ .... और जहाँ न हार हो ना जीत ....? बस साथ -साथ चलता रहता है अपनी हर लय मे आबध्ध .....विरक्त ....जो जाने कितने टुकड़ों में बट गया है....साथ लपेटे ....चलते चलना है... .. अनिरवार ........अज्ञेय जी की कविताओं के इंद्रधनुष झाँक जाते हैं हाथों से .....
एक बेमायना .....वहम और अपनी ही शख़्सियत को तनकीद करता हुआ बसंत अपनी गुपचुप सरगोशीयों में .....बाहर ही कहीं ठिठक जाता है ...उसकी खामोश दस्तक को कुछ देर तवज्जो न दिये जाने पर...असंतुष्ट सा वो चल पड़ता है किसी और दरवाज़े पर दस्तक देने ...... और वो एक क़ातिल लम्हा उम्र भर को गिरां हो जाता है ....मुझपर ...और तुम्हारा इसरार ......गीत गाने को .... तुम अपना रंज ओ गम अपनी परेशानी  मुझे दे दो ......
मैं और शहर ...रात ....के इक खास पहर ...के गुफ्तगू के इंतज़ार में ....
नींद आगोश होती हुई रात ...
संध्या

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