Tuesday, 10 March 2015




कितनी सारी आवाज़ों के बीच
अपनीचिर-परिचित आवाज़ को ढूँढना
दूभर सा क्यों होता जा रहा है इन दिनों ....
कितना संतोष दे जाता था 
एक ही शहर में रहकर भी
कितने कितने दिन न मिलकर
जुड़े रहना बातों में... आवाज़ के साथ
और भर देता था कितनी बेचेनियाँ , बदहवासियाँ
कुछ ही समय को छोड़कर जाना शहर से बाहर मेरा
तुम्हारे अंदर ....
एक -एक पल की खबर रखना तुम्हारा
कहाँ हो ? सब ठीक है न ? अपना ख़याल रखना ....
तरह -तरह के अंदेशे तुम्हारे
और वो एहसास दूरियों का
तुम्हारी वो शीरी खनकदार आवाज़
और "खाँ यार " कह कर बतियाते असंख्य किस्से
और तुम्हारी खिलखिलाहट में बसी वो पुरसुकून लगावट
किस तरह चढ़ गए है भेंट कुछ दुरभिसंधियों के
या महत्वाकांक्षा के पहाड़ चढ़ गिर गए हैं विस्मृति के गर्त में
या चढ़ गई है समय की गर्द उस अदृश्य डोर पर
जिसने जोड़े रखा सदा ही .....
वो पुरशीरी आवाज़ ढूँढती है मेरे मोबाइल को
और मैं ढूँढती हूँ आवाज़ को उसके भीतर शिद्दत से
नदारद बेचेनियों का सुकून .......!!
संध्या

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