ज़रा देर को
कोई एक बादल का टुकड़ा
कर सकता है अदृश्य तुम्हें
अपनी गति के प्रमेय से बंधी
निहारती हूँ अटल तुम्हें ...
हे ध्रुव ....
बनी रहना चाहती हूँ
और भी अधिक धरती
हमेशा के लिए ....
कोई एक बादल का टुकड़ा
कर सकता है अदृश्य तुम्हें
अपनी गति के प्रमेय से बंधी
निहारती हूँ अटल तुम्हें ...
हे ध्रुव ....
बनी रहना चाहती हूँ
और भी अधिक धरती
हमेशा के लिए ....
संध्या
No comments:
Post a Comment