Tuesday, 10 March 2015

सृष्टि के अंतिम छोर पर
डूबता है सूरज
आँखों की कोर में
भरता अंधियारा ....
नहीं डूब पाता हृदय के भीतर
जमा हुआ तुम्हारी कौंध का सूरज
अटका रहता सदा
जीवंतता की मोहर लगाता
जैसे उजागर हो जाता था सन्नाटा
चन्द्रकान्त देवताले जी की कविता
"कुछ तो है तुम में,जो सितार सा बजा लेती हो
सन्नाटे को तुम"
तुम्हारी आवाज़ की
मृदुता के साथ कौंधता ..........
बजता हुआ .....
साहिर, खामोश गुंजाते अपने गीत
तुम्हारे मेरे बीच....तुम्हारे मौन में....
तुम्हारे विश्वास .अति आत्मविश्वासी..
प्रश्नवाद के उत्तर में
चिन्हित...उजियारे के बीच
आ खड़े होते तुम ...
ख़ैयाम के गीत संगीत में
दिलराज कौर की दिलकश आवाज़
को गाती आवाज़ को बार बार
सुनने के इसरार के बीच
कौंधता सूरज .....
हृदय की नदी के पार .....
मुझे खुशी है
"साहिर" अब तक ठहरे हैं वहीं
"ख़ैयाम " भी जैसे साथ साथ चलते हैं
किसी मौन के टुकड़े में
किसी हाँ हूँ के बीच
और स्वीकृति की
म्रदुल मुसकान के बीच .....
सूरज जो दिखता रहा
कहीं डूबता हुआ
दरअसल जगह बदल
आ ठहरता है
दिल के बीचों बीच .....!!

संध्या 

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