Tuesday, 10 March 2015

रात और दिन
रोज़ मिलते हैं ,बिछड्ते हैं
समय के विनिर्दिष्ट बिन्दु पर
और ठीक वहीं मुस्कुरा उठती है साँझ
अपने अस्तित्व को समेटे 
इंद्रधनुषी छटा बिखेरे, क्षितिज पर
लगाती है अपनी जीवंतता
की मोहर ....
अनवरत क्रम लिए
प्रतीक्षारत ...!!
संध्या

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