Thursday, 3 April 2014

चेहरे (2) 


सम्बोधन की उलझन मे फसा 
नाम के साथ 'मेडम जी ' लगाता हुआ 
चार चार हिजजो मे ,हकलाकर 
उच्चारित करता हुआ 
अपनी कमतरी पर 
लगाते ठहाको से बेखबर 
कोई सर पर लगा देता है चपत 
कोई उसकी ऊपरी जेब पर रखी चिल्लर को 
खनखना देता है 
मुझे पानी पिलाता हुआ 
जान बूझ कर लगाया है धक्का किसी ने 
पानी बचाता है छलक़ने से ,
अपनी अदम्य मुस्कुराहट से खुद को नापता जोखता है ,
जोकर सा बना दिये जाने से विरक्त ...
आचरण की सभ्यता को 
इत्मीनान के साथ 
दिखा देता है अंगूठा !!

संध्या 

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