Thursday, 3 April 2014

पुटरिया रंगो की  



रंग कुछ कम थे 
पुराने रंगो की पुटरिया खोली 
अलग अलग रंग संभाल रखे थे 
काम आ सकेंगे कभी ......

आखिर वो कौनसा रंग था..
अधखुला सा..
हरे रंग मे जैसे कासनी रंग मिल गया हो ..

मौसम-मौसम ही आखिर क्यों निकलते हैं रंग ?
जो हमेशा हरहराते रहते हैं उनका क्या ?

इतना आसान कहाँ रंगो मे सराबोर होना
कितनी यादें ... कितनी बातें ...हर बार वही
जितना भिगोते हैं
उतना ही टीस भी दे जाते हैं

चलो फिर से रंग लें और डूब जाएँ
किसी... रंग को अपना बनाने की ज़िद
(क्या होता है ऐसा कुछ?)
न... न ... फिर ये ज़िद नही ...
...बस पास से गुज़र जाएँ ......
आँख भर देख कर ......

और फिर आँखों मे भरे रंग
हाथों से कैसे.....छुए जा सकते है न .....

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