एक नज़्म
कभी सोचना भी पड़े अगर ,
के ये जिस जगह पर खड़े हैं हम
के ये रास्ता ,जो है आता नज़र
पहुँचेगा कहाँ है नही खबर
चलो एक सिम्त को चल पड़ें
कहीं तो पहुचेगी राह ये
जो पहुँच गए ,तो खैर है
न पहुँच सके ,समझ मंज़िल न थी
चलो दूजा चुनते हैं रास्ता
हैं उलझने इसमे भी पाबस्ता
घनी सी धुंध है सामने
है रोशनी मगर जुदा
है शर्त ये ,खुली आँख हो
न हाथ मे कोई हाथ हो
बस खुद एतमादी ही साथ हो
हाँ यहीं मिले खुद की खबर !
संध्या
कभी सोचना भी पड़े अगर ,
के ये जिस जगह पर खड़े हैं हम
के ये रास्ता ,जो है आता नज़र
पहुँचेगा कहाँ है नही खबर
चलो एक सिम्त को चल पड़ें
कहीं तो पहुचेगी राह ये
जो पहुँच गए ,तो खैर है
न पहुँच सके ,समझ मंज़िल न थी
चलो दूजा चुनते हैं रास्ता
हैं उलझने इसमे भी पाबस्ता
घनी सी धुंध है सामने
है रोशनी मगर जुदा
है शर्त ये ,खुली आँख हो
न हाथ मे कोई हाथ हो
बस खुद एतमादी ही साथ हो
हाँ यहीं मिले खुद की खबर !
संध्या
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