सब कुछ हम कहाँ छोड़ आते हैं
जहाँ जाते है वहाँ
खुद का एक हिस्सा छोड़ भी आते है
और ले आते है साथ
कुछ थोड़ी सी गर्द
जिसे लपेटे घूमना चाहते है
कितना भी झटकार लो
कहाँ मुक्त हो पाती है
कभी गर्दन पर ,कभी हथेली के ठीक पीछे
वहाँ की गर्द जहाँ हाथ टिकाए थे थोड़ी देर को
पता नही गर्द ही थी या
गरम पत्थर का एहसास ...
या शायद वो नज़र जो उस समय
तुम्हारे होंठ और नाक के ठीक बीच मे टिकी थी ....
संध्या
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