टुकड़ों मे बंटा सच
ज़िंदगी
बहुत करीब से गुज़री
कुछ कीमत भी न मांगी थी उसने
अपनी सी लगीं ,दो चमकीली
जीवंत आँखें ही तो थीं
पर उस
कुम्हलाई आवाज़ का सत्य
सुनाए जा रहे शब्दों से भारी क्यों हुआ ... ?
और फिर ,
कई टुकड़ों मे बंटा सत्य ....
ज़िंदगी उन सब के
बीच छुपी मुसकुराती रही
पकड़ सको तो पकड़ लो
पकड़े रह सके क्या.... ?
ज़िंदगी की मियाद
किताब के किसी वरक मे
संभाल कर रखी जा सकती है क्या ?
इसके दरवाज़ों पर
कोई सांकल नहीं
फिर कैसे
भाग निकलती है यह ... ?
संध्या
ज़िंदगी
बहुत करीब से गुज़री
कुछ कीमत भी न मांगी थी उसने
अपनी सी लगीं ,दो चमकीली
जीवंत आँखें ही तो थीं
पर उस
कुम्हलाई आवाज़ का सत्य
सुनाए जा रहे शब्दों से भारी क्यों हुआ ... ?
और फिर ,
कई टुकड़ों मे बंटा सत्य ....
ज़िंदगी उन सब के
बीच छुपी मुसकुराती रही
पकड़ सको तो पकड़ लो
पकड़े रह सके क्या.... ?
ज़िंदगी की मियाद
किताब के किसी वरक मे
संभाल कर रखी जा सकती है क्या ?
इसके दरवाज़ों पर
कोई सांकल नहीं
फिर कैसे
भाग निकलती है यह ... ?
संध्या
No comments:
Post a Comment