Thursday, 3 April 2014


ग़ज़ल




जो भी कहती हूँ वो कहती आपकी मर्ज़ी से जनाब 
आपने समझा गर, आपकी ज़र्रानवाजी सर जनाब !

जो कहानी बचपन मे सुनी थी याद है वो आज भी ,
हाँ,सुनाऊँ किसको नही मालूम है मगर , जनाब !

एक गाँव के जैसी हो गई ये दुनिया वो कहते हैं मगर ,
हाँ ,मेरा कहीं लेकिन गुम सा गया है घर जनाब !

जी ,हवा,धूप ,पानी सभी कुछ आपके काबू मे थे ,
हमने केवल अपना दिल बचाया मर -मर जनाब !

कहाँ है दुम,कहीं है सींग और कहीं रोबोट सा है ,
पाल रखखे हैं ये उसने कैसे कैसे डर जनाब !

संध्या

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