ग़ज़ल
जो भी कहती हूँ वो कहती आपकी मर्ज़ी से जनाब
आपने समझा गर, आपकी ज़र्रानवाजी सर जनाब !
जो कहानी बचपन मे सुनी थी याद है वो आज भी ,
हाँ,सुनाऊँ किसको नही मालूम है मगर , जनाब !
एक गाँव के जैसी हो गई ये दुनिया वो कहते हैं मगर ,
हाँ ,मेरा कहीं लेकिन गुम सा गया है घर जनाब !
जी ,हवा,धूप ,पानी सभी कुछ आपके काबू मे थे ,
हमने केवल अपना दिल बचाया मर -मर जनाब !
कहाँ है दुम,कहीं है सींग और कहीं रोबोट सा है ,
पाल रखखे हैं ये उसने कैसे कैसे डर जनाब !
संध्या
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