Thursday, 3 April 2014

ये माना 
ज़िंदगी मे आपधापी बहुत है 
हमने भी चलने की
लेकिन ठानी बहुत है !

एक फंदा 
ज्यो बुना ,दूजा कांधे से फिसला 
सिरा था एक गुमता
दूसरा ढूंढे ना मिला :
शक्तियाँ झोंक दी सारी 
एक चुटकी सुख को पाने मे
खड़ा था बगलगीर सा होकर
सुख मिला ,
लाख धब्बे हों उधड़ी,नेफे की चादर मे ,
बनाकर ओढ़नेमे सुख बहुत है !!

है क्या ऐसी कोई जगह
हैं जाना चाहते जहाँ सब
एक अंधी दौड़ मे होकर के शामिल
एक दूजे को धक्का मारकर
कहीं कुंठित हैं ,कहीं पर मुस्कराते
कहीं रोते हैं
कहीं पर लडखड़ाते ,
रंगबिरगे मुखौटे ओढ़ कर ;
भला कैसे वो अपनी रीड पर खड़ा होगा
जीवन भर रहा हो जो सजदे मे
पैरों को अपने मोड कर ,

जीवन यज्ञ मे
समिधा डाल कर
सहजता की , जीने मे
रवानी बहुत है !!

संध्या

No comments:

Post a Comment