Thursday, 3 April 2014

तरतीब 


गुम हो गई है
एक कविता...

हाँ वही ,
जिसे लिखने से पहले 
लिखते हुए ...और उसके बाद 
एक जीवन जी लिया था मैंने ...

उसे फिर से लिखना चाहूंगी
ठीक उसी तरह....
बिना एक शब्द भी
आगे पीछे किए ;

ठीक उसी तरतीब के साथ ...!!

संध्या

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