Thursday, 3 April 2014

राग बसंती 



पीत पर्ण 
झड़ने लगे हैं 
अंकुआई कोंपलों को 
बुलऔवा देने लगे हैं
ऋतु के फल छट गए हैं 
चटकते सूरज की 
नज़र लग गई है
जाम पर ;

पिघलने
लगे हैं शीत से ,
जम गए दोहे
बासन्ती राग गाती
कोई फगुनिया द्वार पर ,
पिय की बाट जोहे
अंगारे बरसने लगे हैं
घाम पर ;

केसरिया रंग से
टेसू उजास बिखरा रहा है
लगे हैं बौर फलने
आम पर
गदराईं कचनार की कलियाँ
नज़र, हर जम गई है
बासन्ती
शाम पर ! 


संध्या 

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