राग बसंती
पीत पर्ण
झड़ने लगे हैं
अंकुआई कोंपलों को
बुलऔवा देने लगे हैं
ऋतु के फल छट गए हैं
चटकते सूरज की
नज़र लग गई है
जाम पर ;
पिघलने
लगे हैं शीत से ,
जम गए दोहे
बासन्ती राग गाती
कोई फगुनिया द्वार पर ,
पिय की बाट जोहे
अंगारे बरसने लगे हैं
घाम पर ;
केसरिया रंग से
टेसू उजास बिखरा रहा है
लगे हैं बौर फलने
आम पर
गदराईं कचनार की कलियाँ
नज़र, हर जम गई है
बासन्ती
शाम पर !
संध्या
पीत पर्ण
झड़ने लगे हैं
अंकुआई कोंपलों को
बुलऔवा देने लगे हैं
ऋतु के फल छट गए हैं
चटकते सूरज की
नज़र लग गई है
जाम पर ;
पिघलने
लगे हैं शीत से ,
जम गए दोहे
बासन्ती राग गाती
कोई फगुनिया द्वार पर ,
पिय की बाट जोहे
अंगारे बरसने लगे हैं
घाम पर ;
केसरिया रंग से
टेसू उजास बिखरा रहा है
लगे हैं बौर फलने
आम पर
गदराईं कचनार की कलियाँ
नज़र, हर जम गई है
बासन्ती
शाम पर !
संध्या
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