Thursday, 3 April 2014

समय 


वो तो बस चलती रही 
अपनी राह ...बरसो बरस 
कहाँ फुरसत थी
पीछे मुड़ कर भी देख पाती 
हाथ मे लिए कुछ दाने
कब के हाथ से छूट चुके थे 
जाने कब पानी ने अपना रंग दिखाया
धूप अपना काम करती रही
और वो बस चलती रही ...
आज बरबस पीछे मुड़कर जो देखा

जिसे बंजर समझती रही
उस ज़मीन पर कुछ फूल खिल आए थे
आँखों मे रंग उतर आए थे उसकी

संध्या

No comments:

Post a Comment