Thursday, 3 April 2014

एक नज़्म :

यूँ तो बहुत रंग मिले राहों मे
इक रंग जिसने रिझाया मुझको
इक रंग जिसकी खुशबू ने सराबोर किया
इक रंग जिसे बस देखा किए ...
इक खामोशी ओढ़े...गुज़र सा गया
इक रंग ख्वाब का था
एक दिलाता था यक़ी
एक था जिसने यक़ी तोड़ दिया
खुशबू के पुल बनाता हुआ रंग...
दिलों मे राह बनाता हुआ रंग
साथ साथ चलता आवाज़ का रंग
कदमों के निशां छोड़ चला जाता था रंग
सुबह जो आँखों को मला
रंग आँखों से बहुत दूर नज़र आते थे
जाना उनका था खला ...

इससे पहले के कोई रंग जुदा हो जाये
इससे पहले के कोई रंग खुदा हो जाये

कुछ तो साथ लेके चलूँ
कुछ भूल जो पाऊँ ....
इक क्षितिज ओढ़ लूँ
उंकेर लूँ मैं धनक !!

धनक : इंद्रधनुष

संध्या

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