फर्क
उस बड़े शहर से लौट कर
बड़ी बड़ी बातें बड़े शिष्टाचार
बड़े फर्नीचर ,बड़े कमरे ...
दौड़ते हुये लोग ...
उसने कहा मुझसे
हम ऐसे नही बन सकते ?
सिर्फ किताबें हैं यहाँ ...
और हाँ एक अदद तालाब भी है...
हम चुप उसका चेहरा देखते हैं...
अपने काम से लौटने के बाद
उसके हाथ मे एक किताब है ...
और चेहरा चमकता हुआ
ए-76 ,होशंगाबाद रोड मे
हम "हैं "...
और वो सिर्फ दौड़ रहे हैं...
हैं न माँ ?
संध्या
(एक पुरानी डायरी से मिली कविता )
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