प्रेम
वह हर रूप में
ढाल लेता है खुद को
बारिशों मे भिगोता है
सर्द मौसम में बन जाता है बर्फ
पात्र मे माटी के गरम मौसम में
बन ठंडक ठहर जाता है ......
बसंत में आब बन चमकता आँखों में
फूलों की खुशबू में ,रंगों में
भीतर रक्तवर्णी आभा में
जगमगाता
नज़रों मे भर देखो
हर ओर नज़र आता ...
अनुपात और कीमत से
भला कहाँ मापा जाता ...... !
संध्या
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