Thursday, 3 April 2014

पिटारी समय की 


कोई पूछे गए प्रश्न का 
अनुत्तरित सा जवाब ...
जैसे आड़े वक़्तों के लिए
बचा कर रख ली गई
कोई उधड़ गई शतरंजी
या किसी पुरानी 
अधबुनी याद पर लगाए जाने 
के रख लिया गया कोई बटन 
कि,जिससे बंद किए जा सकें 
समय की कोटरों से झाँकते पेबन्द 
बहुत सारी छोटी छोटी डिबिया आवाज़ों की
जिन्हें सुना जा सके गाहे बगाहे
उनमे बंद रखे हुये हुंकारे, मुस्कान और चुटकुले
और जाने कितने खजाने
जिन्होने दिमाग की भूख को वक्त ब वक्त
किया अभिभूत ...
कुछ आधे अधूरे से बने शब्दो के हुजूम
जिन्हे रख दिया गया...
आज भी टकटकी लगाए से ...
एक लंबी यात्रा तय कर
रख ली जाती है अपेक्षाएं
आकांक्षाएं ....आधी अधूरी सी

वक्त के पिटारे मे
कैद कर दी गईं ......
झाँक जाती हैं ...
गाहे बगाहे !!

संध्या

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