परवीन सुल्ताना जी को सुनते हुये (राग मारू विहाग, ख़याल मिश्र भैरवी और होरी गीत सुनाया उन्होने )
समय की
सतरंगी तहरीर पर
वो रागों से लिखरहीं थीं
एक पुरातन कथा ,
झील की शांत
तरंगे दे रही थीं ताल
सूरदास के होरी गीत पर
जैसे उतर आया था बसंत
और जब आकार दिया
इंतज़ार को उन्होने
'मारू विहाग ' में
तो रोयाँ रोयाँ
लहक उठा हो जैसे
और 'मिश्र भैरवी ' मे
जैसे प्रेम का स्वरूप ही
जीवंत हो उठा हो ....
अद्भुत !
संध्या
समय की
सतरंगी तहरीर पर
वो रागों से लिखरहीं थीं
एक पुरातन कथा ,
झील की शांत
तरंगे दे रही थीं ताल
सूरदास के होरी गीत पर
जैसे उतर आया था बसंत
और जब आकार दिया
इंतज़ार को उन्होने
'मारू विहाग ' में
तो रोयाँ रोयाँ
लहक उठा हो जैसे
और 'मिश्र भैरवी ' मे
जैसे प्रेम का स्वरूप ही
जीवंत हो उठा हो ....
अद्भुत !
संध्या
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